कृष्णकुमार

बच्चों को कहानी सुनाना वाकई एक हुनर है। आइए देखते हैं कौन-कौन सी बारीकियां होती हैं कहानी सुनाने में।
यह बड़े अफसोस की बात है कि हमारे प्राइमरी स्कूलों में पहली दो कक्षाओं के लिए प्रतिदिन कहानी सुनाने की कोई अलग ‘घंटी' नहीं होती। यदि ऐसी व्यवस्था होती तो बच्चों को स्कूल में टिकाए रखने की समस्या कम-से-कम एक हद तक सुलझ जाती। बहुत से लोग कहेंगे कि मैं इस समस्या की गंभीरता की अवहेलना कर रहा हूं। बहुत संभव है कि मेरा सुझाव सुनकर कई ऊंचे अधिकारी हिकारत के भाव से मुस्कुराएं। उनके विशाल अनुभव और प्रशासनिक ज्ञान ने यह समझ अवश्य उनके दिमाग से हटा दी होगी, जो मेरी समझ में उनके पास एक समय में ज़रूर रही होगी, कि कहानी सुनाने का बच्चों पर एक जादुई असर होता है।
यह बहुत ही गहरे अफसोस की बात है कि हमारी अध्यापक प्रशिक्षण संस्थाएं भी कहानी सुनाने को गंभीरता से नहीं लेतीं हालांकि उनमें से कुछ अपने पाठ्यक्रम में कहानी सुनाने के महत्व का ज़िक्र जरूर कर देती हैं।

मेरे मन में एक ऐसे दिन की कल्पना है जब छोटे बच्चों को पढ़ाने वाले हर शिक्षक से यह अपेक्षा की जाएगी कि कम-से-कम तीस पारम्परिक कहानियों पर उसका अधिकार हो। अधिकार से मेरा आशय है कि ये कहानियां उसे अच्छी तरह याद हों ताकि वह उन्हें इत्मीनान और आत्मविश्वास के साथ सुना सके। यह एक ऐसे समाज के लिए कोई बड़ी बात नहीं है जिसके पास हज़ारों कहानियों की एक लंबी विरासत है। तीस ऐसी कहानियां, जिन्हें अध्यापक अपनी मर्जी से जब चाहे सुना सके, प्राइमरी स्कूल के पहले दो दर्जा का माहौल बदल कर रख देंगी। शर्त इतनी भर है कि दैनिक पाठ्यक्रम में कहानी सुनाने को एक सम्मानजनक जगह इस खातिर दी जाए कि कहानी सुनाना अपने आप में महत्वपूर्ण है।

कहानियां कहां से लाएं?  
पिछले पैराग्राफ में मैंने एक विशेषण का इस्तेमाल किया है जिसे मैं अब आगे बढ़ने से पहले स्पष्ट करना चाहता हूं। मैंने लिखा है कि मैं पारम्परिक कहानियां सुनाने के पक्ष में हूं। युवा अध्यापकों को कहानी सुनाने का


कहानी : खरगोश कैसे बुद्धिमान कहलाया जाने लगा
बहुत समय पहले की बात है, एक दिन जंगल का राजा शेर भोजन के लिए रोज-रोज शिकार करते-करते थक गया। उसने सोचा, चूंकि सब जानवर निर्विवाद रूप से उसे अपना राजा मानते हैं, इसलिए वह शिकार के पीछे भागने के बजाए, जानवरों को आज्ञा दे देगा कि उनमें से कोई एक रोजाना उसकी भूख मिटाने के लिए आ जाए।
उसने जंगल के जानवरों को अपने पास बुलाया और कहा, 'मेरे प्रजागणों, मुझे अपने भोजन के लिए रोजाना शिकार करना होता है, इससे सारा जंगल मेरे कारण डरा रहता है। मैं तो रोज़ केवल एक ही जानवर को मार कर खाता हूं, पर


प्रशिक्षण देने का मेरा अनुभव बताता है कि जब उनसे सुनाने लायक कहानियां तलाशने को कहा जाता है, तो वे प्रायः बच्चों की किसी पत्रिका में छपी हुई कहानियां ले आते हैं। उनमें से कुछ लोग कॉमिक्स कथाएं उठा लाते हैं और कुछ लम्बे चुटकुले और असली घटनाओं के बयान याद करके ले आते हैं। यह सही है कि इस किस्म की सामग्री को भी 'कहानी' की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन इस तरह की प्रत्येक कहानी से हम प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले छः या सात साल के बच्चों पर जादुई असर करने की उम्मीद नहीं कर सकते।
परम्परा से मिली हुई कहानियों में ऐसी विशेषताएं होती हैं जो समकालीन कहानियों में, जिन्हें हम विविध रूपों और माध्यमों में देखते हैं, अनिवार्यतः नहीं पाई जातीं। इन विशेषताओं की चर्चा हम जल्दी करेंगे, लेकिन पहले मैं पारम्परिक कहानियों के कुछ स्रोतों का जिक्र करना चाहूंगा। सबसे पहले पंचतंत्र, जातक, महाभारत, सहस्र रजनी चरित्र, विक्रमादित्य की कहानियां और विभिन्न इलाकों की लोक-कथाएं सहज और समृद्ध स्रोतों की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। इनके बाद हम कथा सरितसागर, गुलिस्तां और बोस्तां की कहानियां और दुनिया भर की लोक-कथाओं को रख सकते हैं। ये स्रोत आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए यदि कोई पाठ्यक्रम में कहानी सुनाने को एक नियमित जगह देना चाहता है तो उसे इन तमाम स्रोतों से चुनी गई कहानियों का एक संकलन बनाना होगा।

कहने लायक कहानी
एक अच्छी कहानी में कौन-सी विशेषताएं होती हैं, यह जानने के लिए एक सरल रास्ता एक ऐसी कहानी की जांच करने का है जिसे बच्चे पीढ़ियों से आनंदपूर्वक सुनते आ रहे हैं। पंचतंत्र की शेर और खरगोश की कहानी एक ऐसा उदाहरण है। इस कहानी का कथानक उतना आसान नहीं है जितना हम कहानी से अपने परिचय के कारण मान लेते हैं। क्यों न हम पहले इस कहानी के प्रमुख मोड़ याद कर लें।


आप सब इरे-हरे रहते हैं। अब हम लोग एक तर्क-संगत व्यवस्था कर लेते हैं। रोज सुबह होते ही एक जानवर मेरे द्वारा खाए जाने के लिए अपने आप को मेरे सामने प्रस्तुत करेगा। ये आप आपस में फैसला कर सकते हैं कि वह कौन-सा जानवर होगा। इस तरह मैं शिकार करने की परेशानी से बच जाऊंगा। इसका मतलब यह भी होगा कि आप सब जंगल में निडरता से घूम सकेंगे । जानवरों ने आपस में विचार-विमर्श किया और माना कि यह एक तरीका है जो सभी के लिए फायदेमंद है। उन्होंने तय किया कि हर रोज शाम को एक पर्ची निकाली जाएगी। जिसका नाम पची पर लिया है। वहीं अगले दिन शेर का भोजन बनेगा। यह नई योजना तुरन्त लागू कर दी गई, शाम को पर्ची निकाली जाती और सुबह एक बेचारा जानवर शेर के नाश्ते के लिए पेश हो जाता। यह तो सच है कि यह उसे जानवर के लिए बहुत खराब बात होती, परन्तु इससे बाकी सभी जानवरों को


कहानी में एक दिन वह आता है। जब नन्हें खरगोश को बुढे शेर के सामने पेश होना होता है। शेर के दरवाज़े पहुंचने तक खरगोश ने इतनी देर कर दी है कि शेर भूख के मारे पागल हो रहा है। यह निर्णायक क्षण शेर के साथ किसी भी तरह की सौदेबाजी के लिए एकदम अनुपयुक्त है क्योंकि शेर गुस्से से बुरी तरह भरा बैठा है, लेकिन खरगोश अनुपयुक्त क्षण में अपनी बात रखता है कि उसे इतनी देर कैसे हो गई? रास्ते में एक दूसरे शेर से मिलने की बात पूरी तरह झूठ है, लेकिन यह बात भूखे, नाराज़ शेर के शाही दिमाग में बैठ जाती है। अब वह पहले अपने प्रतिद्वंद्वी से निपटना चाहता है और इसके लिए वह खरगोश के साथ उस कुएं की तरफ चल पड़ता है जहां दूसरे शेर के रहने की बात उसे बताई गई है। इस दुसरे निर्णायक क्षण में खरगोश अपनी धोखेबाज़ी और शेर की पागल नाराजगी और ईष्र्या, जिसे उसी ने जगाया है, पर भरोसा करके आगे बढ़ता है। कुएं में अपनी परछाई देखकर शेर आपा खो बैठता है और कूदकर मर जाता है।
आइए, इस पुरानी, परिचित कहानी को जरा बारीकी से देखें। पहली बात तो यह है कि कहानी की विषय-वस्तु में कोई उपदेश नहीं है। उल्टे, यह


घात लगाए घूमते शेर का डर नहीं रहता था, वे जंगल में आजादी से रह सकते थे। योजना सही तरह काम करती लग रही थी ।
एक शाम को जब खरगोश के नाम की पर्ची निकली तो उसने यह घोषणा कर दी कि उसका, शेर का भोजन बनने का कोई इरादा नहीं है।
इस पर लोमड़ी बोली, "शेर अपना वादा निभा रहा है और अब हम निडरता से बाहर घूम सकते हैं।'
बंदर बोला, "खरगोश अगर तुम नहीं गए तो तुम हम सब को खतरे में डालोगे।''
"मैं इस निष्ठर को हमेशा के लिए खत्म कर दूंगा'', खरगोश ने ऐसे विश्वास के साथ कहा जैसा विश्वास वह असल में महसूस नहीं कर रहा था। "देखना,


कहानी सीधे-सीधे इस तरह के गंभीर सवालों से जुझती है - जैसे कि किसी भी पाश्विक ताकत के सामने या मौत के वास्तविक खतरे से अपने को कैसे बचाया जाए। आमतौर पर बच्चों से बातचीत के दौरान हम ऐसे प्रश्नों को नहीं उठाते, लेकिन ज़ाहिर है कि बच्चों की ऐसे प्रश्नों में गहरी रुचि होती है। हम पूछ सकते हैं कि इस रुचि का क्या कारण है, पर इस सवाल की चर्चा में कुछ देर में करूंगा। इस बीच मैं एक और बड़ी विशेषता पर विचार करना चाहता हूं। यह कहानी एक ऐसे छोटे प्राणी की है जो एक बड़े ताकतवर प्राणी द्वारा पैदा की गई मुसीबत से जूझ रहा है। इस मुसीबत से बचने के लिए छोटा प्राणी एक ऐसी तरकीब का प्रयोग करता है जिसे हम आमतौर पर अनैतिक कहते हैं।
इस तरकीब पर अमल करते समय खरगोश व्यक्तित्व के कुछ उम्दा गुणों की मिसाल पेश करता है। इन गुणों में साहस, खतरे के सामने आत्मविश्वास, किसी घटना के अंतिम क्षण तक अपना दिमाग ठंडा रखने की क्षमता, और अपने से ज्यादा ताकत और उम्र वाले से उचित बर्ताव करना शामिल है।
हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि कहानी कितनी तेज गति से आगे बढ़ती है। शुरुआत में एक अजीब-सी व्यवस्था लागू की जाती है। जिसके तहत रोज़ एक जानवर स्वेच्छा से बूढे राजा का शिकार बनेगा। इस तरह की दैनिक व्यवस्था स्थापित होने के बाद जल्दी ही छोटे खरगोश की बारी आती है और कहानी का केन्द्रीय हिस्सा प्रकट होता है। बाकी घटनाएं बहुत तेज़ी से घटती हैं, क्योंकि अपने को बचाने की एक खतरनाक रणनीति तय कर लेने के बाद खरगोश एक भी क्षण बर्बाद नहीं कर सकता। कहानी सुनने वाला संवादों के ज़रिए एक के बाद एक स्थिति से धक्का खाते हुए आगे बढ़ता है। यह स्पष्ट रहता है कि सुनने वाले के पास इस बात का कोई विकल्प नहीं है कि वह स्थिति को खरगोश की निगाह से देखे।

यह संक्षिप्त विश्लेषण उन कारणों की पहचान के लिए पर्याप्त है जिनसे इस कहानी को बच्चों के बीच भारी लोकप्रियता मिली है। सबसे पहली बात यह है कि कहानी उन्हें एक ऐसा चरित्र यानी हीरो देती है जिसके साथ वे पूरा तादात्म्य बैठा सकते हैं। यह चरित्र है खरगोश। कहानी में उसकी भूमिका उसी तरह की चुनौतियों और मुसीबतों से गुजरती है जैसी कि बच्चे अपने दैनिक जीवन में अक्सर महसूस करते हैं। वह छोटा और शक्तिहीन है, उसे एक ऐसा काम करना है जो वह करना नहीं चाहता, उसे एक ऐसे प्राणी के हाथों मारे जाने का डर है जिसके पास पुरी सत्ता भी है और शारीरिक ताकत भी। खरगोश की परिस्थिति के इन पहलुओं से मिलते-जुलते पहलू हर बच्चे की जिन्दगी में उभरते रहते हैं। यद्यपि हम उन्हें अक्सर देख नहीं पाते क्योंकि हम माता-पिता और अध्यापक की भूमिकाएं निभाने में बेहद व्यस्त रहते हैं। उदाहरण के तौर पर हम में से बहुत कम लोग यह जानते हैं कि अचानक होने वाली मृत्यु का डर बचपन में चिन्ता के सबसे बड़े स्रोतों में शामिल है। किसी बड़े और मज़बूत व्यक्ति से आमना-सामना होने की आशंका भी इसी प्रकार की चिन्ता पैदा करती है।
कहानी शुरू होते ही बच्चों का ध्यान इसलिए खींचती है क्योंकि बच्चे स्वयं को कहानी में देख सकते हैं। इसके


कभी तुम सब मुझे धन्यवाद दोगे।”
जंगली मुर्गा बोला, “अगर हमने देखा कि शेर फिर शिकार के लिए घूमने लगा है तो हम सब तुम्हें शुक्रिया नहीं कहेंगे।”
“यह सब तुम मुझ पर छोड़ दो।' खरगोश बोला और आराम से लेट गया। परन्तु खरगोश सोया नहीं। वह घंटों लेटा-लेटा सोचता रहा कि ऐसा क्या हो सकता है, जिससे वह अपनी और अपने साथियों की मदद कर सके और जंगल को उस दुष्ट शेर से छुटकारा मिल जाए। सुबह होते-होते उसे एक उपाय सूझा । जब उसने सब कुछ विस्तार से सोच लिया और उसे तसल्ली हो गई कि उसकी योजना काम करेगी, तब वह अपने आप को तरोताज़ा करने के लिए थोड़ा सो लिया। वह शेर की गुफा तक पहुंचा जब सूरज ऊपर तक चढ़ आया था। शेर बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा था और ज़ोर-ज़ोर से शुर्रा रहा था। वह गुस्सा था, क्योंकि एक तो


बाद कहानी में होने वाली घटनाओं से उनके आकर्षण को बल मिलता है। नन्हा खरगोश एक रणनीति चुनता है और वह कारगर सिद्ध होती है। वह न केवल उसके लिए सफल होती है, बल्कि समस्या को हमेशा के लिए और सबके लिए खत्म कर देती है। छोटे बच्चों को इसी तरह का हल पसंद आता है। खरगोश की रणनीति के आकर्षण का एक और कारण यह है कि वह बच्चों में हमेशा पाई जाने वाली एक भोली-भाली इच्छा पर आधारित है - बहाना बनाने की इच्छा। देरी से आने के खरगोश द्वारा दिए गए बहाने में एक और आकर्षण यह है कि उसका उद्देश्य अपनी जान बचाना नहीं, शेर को मारना भी है। वास्तव में खरगोश की दुविधा इसलिए इतनी कठिन है कि क्योंकि वह अन्यायी को जान से मारे बगैर खुद को बचा नहीं सकता। इसी तरह कहानी बच निकलने का एक जबरदस्त नाटक पेश करने के लिए, बहादुरी से किए गए नाश का इस्तेमाल करती है। यदि उसमें कोई नैतिकता है तो वह आत्म-रक्षा की नैतिकता ही है। इस बात को भी हम तभी ठीक से देख सकते हैं जब हम कहानी को बच्चे की निगाह से देखें। यदि हम बड़ों की निगाह से इस कहानी को देखने की जिद करें तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि यह एक अनैतिक कहानी है - जैसी कि वह दरअसल है भी।

ज़रूरत क्या है?   
अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि बच्चों के लिए एक अच्छी कहानी सुनने का नैतिकता या नैतिक शिक्षा से कोई संबंध नहीं है या कम-से-कम सीधा संबंध नहीं है। अधिक गहरे स्तर


खरगोश का देर से आना उसके अपमान का प्रतीक था और दूसरा वह भूखा भी था। जैसे ही खरगोश आगे बढ़ा, शेर दहाड़ा, “क्या तुम मेरा नाश्ता हो?''
"हां, सरकार', खरगोश ने आदर से उत्तर दिया।
"तो फिर तुम देर से क्यों आए?'' शेर ने गुस्सा होकर पूछा।
"मैं बताता हूं, सरकार', खरगोश बोला। "तड़के जब मैं यहां आ रहा था तो मुझे एक दूसरे शेर ने रोक लिया। उसने कहा कि मैं आगे नहीं जा सकता क्योंकि वह मुझे नाश्ते में खाना चाहता है। मैंने उनसे मिन्नतें की कि मैं नहीं रुक सकता, मुझे जंगल के राजा की आज्ञा के अनुसार उनके पास पहुंचना है। इस पर वह बहुत गुस्सा हो गया और कहने लगा कि वह ही जंगल का राजा है। और वह दहाड़ा, “जाओ और जाकर मेरा अधिकार छीनने वाले शेर को कहो कि, मैं यहां हूं और मैं आकर तुम्हें मार डालूंगा । बाकी सभी जानवरों को भी कह दो कि जंगल


पर खरगोश और शेर की कहानी में एक प्रेरक बात है। वह दिखाती है कि खतरे के सामने दिमाग ठंडा रखने के क्या फायदे हैं। कहानी यह भी दिखाती है कि सोच-समझ और कल्पना से काम लेना कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन ये बातें पारम्परिक अर्थ में 'नैतिक शिक्षा' नहीं कहीं जा सकतीं। वास्तव में महान पारम्परिक कहानियां शायद ही पारम्परिक अर्थ में नैतिक शिक्षा देती हों। हमारे लिए ज्यादा ज़रूरी इस बात पर गौर करना है कि कहानी सुनाने का उद्देश्य बच्चे का नैतिक विकास करना नहीं है। कहानी सुनाने से होने वाले लाभ काफी अलग हैं, और वे इस प्रकार हैं।

कहानियां अच्छी तरह सुनने की क्षमता का विकास करती हैं: अच्छा श्रोता कौन है? वह जो अन्त तक सुनता रहे। यह बात हम बहुत से लोगों के बारे में नहीं कह सकते। यहां तक कि औपचारिक बहसों के दौरान भी लोग लगातार टोकते रहते हैं। इसका कारण उनकी यह मानकर चलने की आदत है कि उन्हें पहले से पता है कि बोलने वाला क्या कहेगा। एक और कारण यह है कि उनमें सुनने का धैर्य नहीं होता। आश्चर्य की बात नहीं कि सुनने को अब सिर्फ एक कौशल नहीं, बल्कि एक रवैया माना जाने लगा है जिसे प्रोत्साहित करने के लिए ऊंचे स्तर के प्रबंधन और प्रशासन के कोर्स उपलब्ध हैं। कहानी सुनाने से हमारी जिन्दगी के उस निर्णायक दौर में धैर्यपूर्वक सुनने की क्षमता विकसित होती है जब सुनने की आदत और उसमें निहित रवैया जीवन भर चलने वाली आदतों का रूप ले सकते हैं।
यह बात थोड़ी अजीब है कि अच्छे श्रोता हमारे उस देश में दुर्लभ हो गए हैं जहां एक पुरानी और मजबूत मौखिक संस्कृति रही है। मेरा अंदाज़ है कि इस परिस्थिति का संबंध बचपन में कहानी सुनाने की अवहेलना से है। ऐसा लगता है कि आधुनिक भारत के पास बच्चों को नियमित रूप से कहानी सुनाने का समय नहीं है। इस कमी के परिणाम अब स्पष्ट होते जा रहे हैं।

कहानी सुनाने से अंदाज़ लगाने का प्रशिक्षण मिलता है: अपनी पसंद की कहानियां बच्चे बार-बार सुनना चाहते। हैं। इसका कारण यह है कि कहानी से एक बार अपना परिचय हो जाने पर वे इस परिचय का इस्तेमाल गौर से सुनने की अपनी बढ़ती हुई क्षमता का परीक्षण करने के लिए करते हैं। स्वाभाविक है कि ये परीक्षण अनजाने में होता है। बच्चों को इस बात से खुशी होती है कि कहानी को दूसरी या तीसरी बार सुनते समय वे


का असली राजा आ गया है और वह पाखंडी को भगा देगा।'' “इसलिए सरकार' अरगोश आगे बोला, "इससे पहले कि आप मुझे अपना नाश्ता बनाएं, मैं आपको सावधान करता हूं कि आपकी जान को बहुत खतरा है।”
शेर को अपनी भूख और अनादर के कारण बहुत गुस्सा आ गया। वह जोर से चिल्लाया, “पाखंडी! पाखंडी तो वह है, मुझे अभी उसके पास ले चलो, मैं उसे दिखाऊंगा कि कौन जंगल का राजा है।”
खरगोश चल पड़ा और उसके पीछे-पीछे चल पड़ा शेर। | "अब ध्यान से चलें, हम उस बगावती लुटेरे की गुफा तक पहुंच रहे हैं।" खरगोश फुसफुसाया।


सफलतापूर्वक अंदाज़ लगा सकते हैं। कि आगे क्या होगा। अंदाज़ के सही सिद्ध होने का आनन्द ही वह इनाम है। जो कहानी सुनने से एक अनुभवी श्रोता को मिलता है, और यह सिर्फ आनन्द नहीं है। इससे कहानी सुनने वाले बच्चे की अंदाज़ लगाने की क्षमता से विश्वास भी बढ़ता है। सर्वांगीण विकास में इस विश्वास की एक गहरी भूमिका होती है - खासकर पढ़ने की क्षमता के विकास में। यह क्षमता स्कूल के शुरुआती दो वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती होती है। साक्षरता और पढ़ने की क्षमता के विकास में अंदाज़ लगाने की क्षमता के योगदान की विस्तृत चर्चा मैंने अपनी पुस्तक 'बच्चे की भाषा और अध्यापक' में की है।
अंदाज़ लगाने की क्षमता का महत्वपूर्ण योगदान अन्य विषयों, विशेषकर गणित और विज्ञान में भी है। गणित की पढ़ाई में नियमों के इस्तेमाल से समस्या का हल निकालने का सैद्धांतिक महत्व है। कहानियों में भी नियम होते हैं। फर्क यही है कि ये नियम रूपकों की शक्ल में होते हैं। मिसाल के तौर पर कई कहानियां इस नियम का पालन करती हैं कि छोटे प्राणी बड़ों को धोखा देकर विजय प्राप्त करते हैं। खरगोश और शेर की कहानी में यही होता है। कहानियां सुनते-सुनते बच्चे उनमें निहित नियम पकड़ लेते हैं, और यह पकड़ उनकी अंदाज़ लगाने की क्षमता को बेहतर बनाती है।

कहानियां हमारी दुनिया को फैलाती हैं: मैं उस दुनिया की बात कर रहा हूं जिसे हम अपने सिर या दिमाग में लेकर चलते हैं। कहानियां उसे इस अर्थ में फैलाती हैं कि हम उनके जरिए ऐसे लोगों और स्थितियों को जान लेते हैं जिनसे हमारा वास्ता अपनी


वास्तव में वह खरगोश, शेर को एक गहरे कुएं की तरफ ले जा रहा था। जब वह वहां पहुंचा तो उसने शेर को थोड़ा रुकने को कहा और खुद धीरे से कुएं के पास आया। फिर वह किनारे के ऊपर से नीचे पानी को ध्यान से देखने लगा। उसने अपने छोटे से चेहरे का साफ प्रतिबिम्ब देखा। फिर उसने शेर को आवाज दी और कहा, “यहां नीचे देखिए, यही है जो आपका शासन छीनना चाहता है।''
शेर गुस्से से त्यौरियां चढ़ाता और बड़-बड़ करता कुएं की दीवार के किनारे तक पहुंच गया। उसने जब नीचे झांका तो उसे एक क्रोधित शेर का त्यौरी चढ़ा और बड़े-बड़े करता हुआ मुंह दिया जो उसे घूर रहा था। वह उस दुश्मन पर कूदा, थोड़ी देर छटपटाया और फिर डूब गया।
खरगोश फटाफट दूसरे जानवरों के पास वापस पहुंचा और यह घोषणा कर दी कि उसने शेर को मार दिया है, अब उन सब के इरने के दिन खत्म हो गए हैं। फिर


ज़िन्दगी में कभी नहीं पड़ा।
सवाल है कि ऐसे लोगों या स्थितियों को जानने से क्या फायदा है? फायदा यह है कि वे जीवन का अंग हैं। भले हम व्यक्तिगत रूप से उन्हें न जानते हों पर वे हमें दिमागी रूप से परेशान करती हैं, खासकर बचपन में - लेकिन एक सामान्य अर्थ में यह परेशानी जीवन भर चलती है। उदाहरण के लिए छोटे बच्चे बुरे आदमियों की फिक्र करते रहते हैं, भले ही उनके आसपास कोई बहुत बुरा आदमी न हो। इसी तरह वे भीतर यह आशा करते हैं कि उन्हें किसी बेहद होशियार, मुन्दर या अच्छे इंसान से मिलने का मौका मिलेगा। आदर्श रूप की कल्पना और भयंकर विपत्ति का डर, दोनों ही बाल-मनोविज्ञान में शामिल हैं। पारम्परिक कहानियां इस मनोविज्ञान को व्यंजित करती हैं, और इसीलिए वे बच्चों को आसानी से खींच लेती हैं। कहानी सुनने से छोटा बच्चा, जो अभी साक्षर नहीं बना है, अपनी वास्तविक दुनिया से कहीं बड़ी दुनिया के कल्पित रूप का अनुभव पा लेता है।
एक बात और भी है कि कहानियों से मिलने वाला अनुभव बेतरतीब नहीं होता। उलटे, यह अनुभव हमारी अराजक दुनिया को एक संतोषजनक क्रम या बुनावट में ढाल देता है। एक गहरे अर्थ में यह एक 'नैतिक' बुनावट होती है - लेकिन एक आम अर्थ में नहीं। कमज़ोर जीतता अवश्य है, लेकिन कई बार गलत साधनों का प्रयोग करके। भूखे शेर से खरगोश का झूठ बोलना एक उदाहरण है।
 
कहानी सुनना और पढ़ना   
अंत में, कहानी कहने का महत्व हम बच्चे के भाषाई साधनों के विस्तार में देख सकते हैं। शब्द एक बहुत ही निजी सम्पत्ति होते हैं। वे हमें एक बहुत निजी अर्थ में संसार की चीजों को अलग-अलग नाम देने की क्षमता देते हैं। लेकिन दूसरी तरफ शब्द एक ऐसी सामाजिक सम्पत्ति भी है जिसका इस्तेमाल हम दूसरों से अपने अनुभव बांटने के लिए करते हैं। शब्दों की यह दो-तरफा प्रकृति ही उन्हें अर्थ देती है। उदाहरण के लिए बच्चे को अपने निजी अनुभव से यह मालूम होता है। कि भूख लगने पर शेर को कैसा महसूस हो रहा होगा। कहानी बच्चे को 'भूखा' शब्द का अर्थ इस तरह फैलाने में मदद देती है कि उसमें शेर भी शामिल हो जाए। बच्चे जितनी ज्यादा कहानियां सुनेंगे, उनकी शब्दावली में उतना ही दूसरों के अनुभवों का अर्थ शामिल करने की सामर्थ्य आती जाएगी। इस तरह देखें तो बचपन में सुनी गई कहानियां आगे चलकर पढ़ने की क्षमता का आधार बनती हैं।
वास्तव में कहानी के संदर्भ में ऊपर कही गई चारों बातें पढ़ने पर भी लागू होती हैं। पढ़ने की क्षमता बच्चों का परिचय भाषा में निहित नियमों और संरचनाओं से कराती है। अच्छी तरह पढ़ने की क्षमता होशियारी से अंदाज़ लगाते चलने की आदत पर निर्भर है। भाषा के नियमों से परिचित होकर बच्चे यह अंदाज़ लगा लेते हैं। कि वाक्य या कथन में आगे क्या आने वाला है। इस दृष्टिकोण से कहानी सुनाना बच्चों को साक्षर बनाने के लिए उपयोगी है।


उसने सबको अपने कारनामे की कहानी सुनाई और बताया कि उसने यह सब कैसे किया। सभी जानवरों ने उसकी चतुराई की खूब प्रशंसा की।
उस दिन के बाद से जानवर अपनी समस्याएं सुलझवाने और झगड़े दूर करने के लिए हमेशा खरगोश से गुजारिश करते और उसके पास सलाह लेने जाते । बस इसी तरह वह ‘बुद्धिमान खरगोश' के नाम से जाना जाने लगा।

स्रोतः बर्मा और धाय की परियों की । हो, सोमैया, बंबई।


कहानी सुनाने का कौशल   
कहानी सुनाने की कला पर अधिकार पाने के इच्छुक व्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि वह स्मृति को गंभीरता से लें। यदि कहने वाले को कहानी ठीक से याद नहीं है तो वह अच्छी से अच्छी कहानी को भी चौपट कर सकता है। याद कर लेने से आत्मविश्वास बढ़ता है और कहानी कहने वाला इत्मीनान महसूस करता है। कहानी सुनने वालों से रिश्ता बनाने के लिए इत्मीनान या चैन बहुत जरूरी है। दूसरी बात यह है कि जब तक कहानी अच्छी तरह याद हो जाती है तो कहने वाला उसे एक खाके या खाली नक्शे की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
इस नक्शे को अपनी सुविधा या सुनने वालों के मूड के अनुसार भरा जा सकता है। कहानी को छोटा या बड़ा करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। किसी दिन आप चाहते हैं कि जल्दी-जल्दी उस बिन्दु पर पहुंच जाएं जहां खरगोश शेर के सामने खड़ा है। किसी और दिन आपकी इच्छा होती है कि कहानी के पहले हिस्से को फैलाएं, इस बात की विस्तृत चर्चा करें कि भोजन के इंतज़ार में शेर के मन में कैसे-कैसे विचार आ रहे होंगे और शेर की गुफा की तरफ जाते हुए खरगोश के दिमाग में कौन-कौन-सी बातें और रणनीतियां उभर रही होंगी।

कहानी को लेकर बच्चों के साथ संवाद कई तरह के विकल्प पेश करता है। आप चाहें तो नाटकीय ढंग से दो आवाजों में बोलें, इशारों या मुद्राओं से भी काम लें। संवाद को सजीव बनाने के लिए आप हाथ की कठपुतलियों का प्रयोग भी कर सकते हैं। आप कमरे के एक कोने से दूसरे कोने तक चलकर दोनों चरित्रों की भूमिका खुद निभा सकते हैं। ये सभी संभावनाएं रोचक हैं। और वे हमें इस बात की चुनौती देती हैं कि हम एक ही कहानी को साल-दर-साल या एक ही साल में कई बार सुनाते हुए अपनी सामर्थ्य बढ़ाते चलें।
कहानी सुनाना यदि किसी शिक्षक की दैनिक ज़िन्दगी में शामिल है तो वह कभी उबाऊ नहीं हो सकती। पर कहानी को रोज़ की घटना बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि हम प्राइमरी स्कूल के पाठ्यक्रम की अपनी धारणाओं को गंभीरता पूर्वक बदलें।


कृष्णकुमारः प्रसिद्ध शिक्षाविद एवं लेखक। शिक्षा के मुद्दों पर सतत चिंतन एवं लेखन। राज, समाज और शिक्षा; बच्चे की भाषा और अध्यापक आदि चर्चित कृतियां हैं।
चित्रः अतनु रॉय, देशराज एवं पुलक बिस्वास।
यह लेख 'प्राथमिक शिक्षा के मुद्दे के जनवरी -अप्रैल 2000 अंक से लिया गया है।